किसान आंदोलन, उपद्रव, विद्रोह, दंगा या गुंडई

आज सुबह से गणतंत्र दिवस की बधाई की बाढ़ सी आयी हुई है व्हाट्सएप, फेसबुक एवं अन्य सोशल मीडिया ग्रुप पर, मैंने किसी को संदेश नहीं भेजा, जवाब नहीं दिया। बार बार अंतर्मन में सवाल उठ रहे थे, कि क्या यही असली गणतंत्र है , क्या इसी गणतंत्र या लोकतंत्र का सपना देखा था संविधान के रचियता ने। आन्दोलन तो पहले भी हुए है इस देश में, शांतिपूर्वक अपनी बात कहने का, आन्दोलन करने का अधिकार है सभी को। किसी वर्ग विशेष का किसी भी बिल से या सरकार से असहमति होना समझ में आता है, पर ये समझ से परे है कि आप रास्ते बाधित करो, राष्ट्रीय झंडे का अपमान करो, लालकिले पर, जो देश की अस्मिता को प्रतीक है, वहां कोई और झंडा लहरा दो, जब जिसका दिल करे वो दिल्ली की सड़को को बाधित कर दे, दिल्ली को बंधक बना ले, कैसा लोकतंत्र या गणतंत्र का पर्व बना रहे है हम और फिर कैसी शुभकामनाए, कोन है ये लोग और कहां से आते है, और कैसे समझाए इनको। मुझे तो रामचरित मानस की ये पंक्तियां यहां यथार्थ प्रतीत होती है..
विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति , बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीति ।

Welcome to WordPress. This is your first post. Edit or delete it, then start writing!

3 thoughts on “किसान आंदोलन, उपद्रव, विद्रोह, दंगा या गुंडई”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *